
Chadariya Jhini Re Jhini
चदरिया झीनी रे झीनी
Vishnu Bhajan
A profound mystical bhajan by the 15th-century poet-saint Kabir, using the metaphor of a delicately woven shawl (chadar) to describe the human body and soul given by the Creator.
ॐ
चदरिया झीनी रे झीनी,
राम नाम रस भीनी।
चदरिया झीनी रे झीनी॥
अष्ट कमल का चरखा बनाया,
पांच तत्त्व की पूनी।
नौ दस मास बुनन को लागे,
मूरख मैली कीनी॥
चदरिया झीनी रे झीनी।
जब मोरी चादर बन के तैयार भई,
लाग जाने कित खोई।
दास कबीर जतन करि ओढ़ी,
ज्यों की त्यों धर दीन्ही॥
चदरिया झीनी रे झीनी,
राम नाम रस भीनी।
सो चादर सुर नर मुनि ओढ़ी,
ओढ़ि के मैली कीन्ही।
दास कबीर जतन करि ओढ़ी,
ज्यों की त्यों धर दीन्ही॥
चदरिया झीनी रे झीनी,
राम नाम रस भीनी।
चदरिया झीनी रे झीनी॥
ॐ